बादल तब बनते हैं जब पृथ्वी से जल वाष्प वायुमंडल में ऊपर उठता है और ऊपर उठने के दौरान हवा के दबाव और तापमान में गिरावट के कारण यह हवा में बहुत छोटे कणों (एरोसोल) पर संघनित हो जाती है, अंततः संघनित वाष्प सघन हो जाती है और अपने भार के अनुसार, बादलों के रूप में वायुमंडल की विभिन्न ऊँचाइयों में वितरित हो जाती है। पानी की लाखों बहुत छोटी-छोटी बूंदें एकत्रित होकर बादल बनाती हैं। वायुमंडल में बादलों का वितरण पृथ्वी की घूर्णन गति के साथ-साथ तापमान, दबाव और वायुमंडलीय परिसंचरण जैसी अन्य वायुमंडलीय घटनाओं से भी प्रभावित होता है। पृथ्वी के एक हिस्से में बने बादल वायुमंडल में अलग-अलग दिशाओं में स्थानांतरित हो सकते हैं, संघनित हो सकते हैं और पृथ्वी के अन्य सुदूर हिस्सों में वर्षा के रूप में गिर सकते हैं। उदाहरण के लिए, भारत में मानसून के मौसम के दौरान जो बादल ज्यादातर महासागरों के ऊपर बनते हैं, वे वायुमंडल में यात्रा करते हैं और भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर प्रवेश करते हैं, समय के साथ अलग-अलग तरह से प्रसारित होते हैं और विभिन्न वर्षण के रूपों में गिरते हैं।
बादल बनना एक दिलचस्प प्राकृतिक घटना है जिसके बारे में आमतौर पर लोगों को जानकारी नहीं होती है। बादलों और उनके प्रकारों को ध्यान से देखने से हम वायुमंडल में उनके प्रकार और वितरण को समझना सीखते हैं। अभ्यास करके हम बादलों की संरचना के अनुसार अलग-अलग समय/ऋतुओं के दौरान मौसम की स्थिति का अनुमान भी लगा सकते हैं। जब पानी की बूंदें एकत्र नहीं होती हैं और बिखरे हुए रूप में रहती हैं तो उनके माध्यम से परावर्तित सूर्य के प्रकाश की मात्रा अधिक होती है और पृथ्वी से ये बादल हल्के रंग/सफेद (गैर-बरसाती बादल) जैसे दिखते हैं, लेकिन जब पानी की बूंदें एक साथ बड़ी बूंदों में एकत्रित होती हैं तो उनसे परावर्तित सूर्य का प्रकाश कम होता है और वे काले (बरसाती बादल) दिखते हैं।
बादलों की बुनियादी परिस्थितियां जिन्हें उनके वर्गीकरण में संदर्भित किया जाता है -
बादलों के बारे में जानकारी, किसानों और आम जनता के लिए सूचना, विशेष रूप से मानसून के मौसम के दौरान वर्षा , तूफान, गरज जैसी संभावित मौसम स्थितियों के बारे में तथा चेतावनी प्रसारित करने में बहुत उपयोगी हो सकती है।
बादलों को जमीन से वायुमंडल में उनके ऊर्ध्वाधर वितरण के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है -
ऊर्ध्वाधर श्रेणियों को उनकी संरचना और गठन के अनुसार आगे वर्गीकृत किया जाता है।
निचले स्तर के बादल पृथ्वी की सतह से 2 किमी तक निचले वायुमंडल में स्ट्रेटस (क्षैतिज रूप से विकसित) प्रारूप में बनते हैं। उनकी वितरण ऊँचाई ध्रुवीय, समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समान होती है। इन्हें आगे तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
i) स्ट्रैटस बादल: ये बादल धूसर रंग के होते हैं और पृथ्वी की सतह के बहुत करीब स्थित होते हैं। वे आम तौर पर चादर जैसी परत की तरह दिखते हैं लेकिन कभी-कभी टुकड़ों में भी पाए जाते हैं। वे शायद ही कभी वर्षण करते हैं।
ii) स्ट्रैटोक्यूमुलस बादल: ये बादल धूसर या सफेद रंग के होते हैं। बादलों का आधार चपटे की अपेक्षा अधिक गोलाकार होता है। इनका निर्माण पुराने स्ट्रेटस बादलों से या बाहर फैल रहे क्यूमुलस बादलों से हो सकता है। वे पतले और घने क्षेत्रों वाले बादलों के झुण्ड की तरह दिखाई देते हैं।
iii) निंबोस्ट्रेटस बादल: इन बादलों का नाम लैटिन शब्द 'निंबस' से लिया गया है जिसका अर्थ है वर्षा वाला बादल। ये बादलों की घनी, काली, धूसर, आकृतिहीन परतें हैं, जो कि इतनी मोटी होती हैं जो सूर्य को अवरुद्ध करके वर्षण के रूप में लगातार वर्षा और संभवतः बर्फ के रूप में वर्षण करती हैं।
मध्य स्तर के बादल वायुमंडल में पृथ्वी की सतह से 2 से 8 किमी की ऊँचाई तक बनते हैं। विभिन्न अक्षांशीय क्षेत्रों में इनकी ऊँचाई भिन्न-भिन्न होती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में ये 2 से 4 किमी की ऊंचाई पर बनते हैं, समशीतोष्ण क्षेत्र में ये 2 से 7 किमी की ऊंचाई पर बनते हैं और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ये पृथ्वी की सतह से 2 से 8 किमी की ऊंचाई पर बनते हैं। इन्हें दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
i) आल्टोस्ट्रेटस बादल: ये बादल नीले या धूसर रंग के आवरण वाले सपाट, और एक समान प्रकार की बनावट की तरह दिखाई देते हैं जो पूरी तरह या आंशिक रूप से आकाश को ढक लेते हैं। इनके माध्यम से सूर्य का प्रकाश तो देखा जा सकता है लेकिन कोई प्रभामंडल प्रभाव नहीं होता। जब तक वे स्ट्रेटस परत में नीचे नहीं जाते और मोटे नहीं हो जाते, तब तक वे स्वयं महत्वपूर्ण वर्षण नहीं करते हैं।
ii) आल्टोक्यूमुलस बादल: ये बादल 'क्यूमुलो' प्रकार की विशेषता प्रदर्शित करते हैं और समुद्र की सफेद और भूरे रंग की लहरों की तरह बादलों की पंक्तियों के रूप में छाया की तरह फैल जाते हैं। इन बादलों में अधिकतर पानी की बूंदें और संभवतः कुछ बर्फ के माणभ भी होते हैं।
उच्च स्तरीय बादल पृथ्वी की सतह से 3 से 18 किमी की ऊँचाई तक वायुमंडल में बनते हैं। विभिन्न अक्षांशीय क्षेत्रों में इनकी ऊँचाई भिन्न-भिन्न होती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में ये 3 से 8 किमी की ऊंचाई पर बनते हैं, समशीतोष्ण क्षेत्र में ये 5 से 14 किमी की ऊंचाई पर बनते हैं जबकि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ये पृथ्वी की सतह से 6 से 18 किमी की ऊंचाई पर बनते हैं। इन्हें आगे तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
i) सिरस बादल: ये बादल सफेद नाजुक पंखों की तरह दिखते हैं। वे आम तौर पर बहुत पतले अस्पष्ट होते हैं और पूरी तरह से बर्फ के माणभों से बने होते हैं।
ii) सिरोस्ट्रेटस बादल: ये बादल बर्फ के माणभों से बनी एक पतली, लगभग पारदर्शी, सफेद घूंघट जैसी परत के रूप में दिखाई देते हैं। जब चंद्रमा की रोशनी या सूर्य का प्रकाश उनके बर्फ के माणभों से होकर गुजरता है तो प्रकाश उसी तरह बिखर जाता है जैसे जब प्रकाश किसी प्रिज्म से गुजरता है, और जिसके परिणामस्वरूप एक प्रभामंडल का निर्माण होता है।
iii) सिरोक्यूमुलस बादल: ये बादल पतली सफेद परत जैसे होते हैं जिनकी बनावट उन्हें कपास के टुकड़े या बिना छाया के लहरदार दिखती है। इनमें मुख्य रूप से बर्फ के माणभ होते हैं और संभवतः कुछ बहुत ठंडी पानी की बूंदें भी होती हैं।
इस प्रकार के बादल पृथ्वी की सतह के निकट निचले वायुमंडल में क्यूमुलस (ऊर्ध्वाधर रूप में विकसित) प्रारूप में बनते हैं और ऊँचाई की ओर उच्च स्तर तक बढ़ते हैं। इन्हें दो प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है -
i) क्यूमुलस बादल: इन बादलों का आधार सपाट और घना, टीले के आकार का शीर्ष होता है जो एक बड़ी फूलगोभी जैसा दिखता है और ऊर्ध्वाधर बढ़ता है। जब सूर्य का प्रकाश इन बादलों से टकराता है तो वे चमकीले सफेद रंग के दिखते हैं। इनका आधार गहरे धूसर रंग का होता है। ये आम तौर पर वर्षण नहीं करते हैं।
ii) क्यूमुलोनिम्बस बादल: ये बड़े, भारी और घने बादल हैं। इनकी सतह आम तौर पर सपाट, गहरे रंग की होती है और चोटी बहुत ऊंची और बड़े आकार की होती है जैसे विशाल पर्वत या ब्लॉक के आकार की। इन बादलों में अक्सर आवेशित पानी की बूंदों के बीच टकराव और के कारण बिजली और गड़गड़ाहट, और कभी-कभी ओलावृष्टि होती है। ये बवंडर भी उत्पन्न कर सकते हैं।