पानी में क्लोरीन दो रूपों में मौजूद हो सकती है, ‘उपलब्ध क्लोरीन’ जो पानी में प्राकृतिक रूप से मौजूद होती है और ‘अवशिष्ट क्लोरीन’ जो अतिरिक्त होती है और बाहर से मिलाई जाती है। बाहरी मिलाने योग्य क्लोरीन कई रूपों में आती है जैसे कणिकाएँ, गोलियाँ, पाउडर, तरल और गैस। यह पानी में आसानी से घुल जाती है। जब क्लोरीन को पानी में मिलाया जाता है, तो यह कार्बनिक पदार्थों पर हमला करती है और उन्हें नष्ट करने का प्रयास करती है। यदि पर्याप्त मात्रा में क्लोरीन मिला दी जाए, तो सभी संभावित जीवों को नष्ट करने के बाद भी कुछ मात्रा में पानी में रह जाती है और इसी बची हुई क्लोरीन को ‘अवशिष्ट क्लोरीन’ कहा जाता है। यह पानी से रासायनिक संदूषकों को नहीं हटाती है।
हालाँकि क्लोरीन सभी सूक्ष्म जीवों को नष्ट नहीं करती है लेकिन यह विभिन्न प्रकार के रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों के विरुद्ध प्रभावी है। जल उपचार स्थान पर ही यह अधिकांश सूक्ष्म जीवों को मार देती है, और इसकी अवशेष मात्रा रहने के फलस्वरूप पाइपलाइन में जल प्रवाह के दौरान इस रसायन को उपभोक्ता तक जल पहुंचने से पहले अपनी विसंक्रमण क्रिया करने का समय मिल जाता है। पीने के पानी में अवशिष्ट क्लोरीन की उपस्थिति इंगित करती है कि अधिकांश सूक्ष्मजीवी जीव मारे गए हैं और पानी भंडारण के दौरान पुन: संदूषण से पानी तब तक सुरक्षित रहेगा जब तक कि अवशिष्ट क्लोरीन स्वयं नष्ट न हो जाए या पानी को गर्म करके उसे दूर न किया जाए। घरेलू उपयोग के लिए उपभोक्ता पर पानी पहुँचने के स्थान पर अवशिष्ट क्लोरीन की मात्रा 0.2 से 0.5 मिलीग्राम प्रति लीटर के बीच होनी चाहिए।
अवशिष्ट क्लोरीन के आकलन की विभिन्न विधियाँ हैं। सबसे सरल और त्वरित तरीका ‘डीपीडी’ (डाईइथाइल पैराफिनाइलिन डाईएमिन) संकेतक डालकर पानी के रंग में परिवर्तन की एक मानक रंग तुलनित्र से तुलना करके इसकी सांद्रता का पता लगाना है।