मृदा के निर्माण की प्रक्रिया के समय बहुत सारी भौतिक, रासायनिक और जैविक गतिविधियाँ एक साथ होती हैं और अंततः सैकड़ों वर्षों की लंबी प्रक्रिया के बाद विशिष्ट परतों वाली मृदा का निर्माण होता है। मृदा की सतह के समानांतर विभिन्न परतों का ऊर्ध्वाधर स्वरूप जिनकी भौतिक, रासायनिक, जैविक विशेषताएँ ऊपर और नीचे की परत से भिन्न होती हैं, मृदा संस्तर कहलाती हैं। मृदा के संस्तरों को उनकी अलग-अलग परतों के ऊर्ध्वाधर क्रम के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है। अधिकंश्तः मृदा के संस्तरों की सीमाएँ विशिष्ट विभाजन रेखाओं के बजाय परिवर्तित होते क्षेत्र के रूप में होती हैं। प्रत्येक संस्तर की चौड़ाई यानी प्रत्येक संस्तर की ऊपरी और निचली सीमाओं की गहराई मिट्टी बनाने की उन प्रक्रियाओं की जानकारी प्रदान करती है, जिनसे मिट्टी का निर्माण हुआ है। अधिकांश संस्तरों की गहराई स्थिर नहीं होती।
किसी क्षेत्र में मिट्टी के संस्तरों का वर्णन और व्याख्या करने के लिए विभिन्न मिट्टी के संस्तरों को मुख्य संस्तर संसूचक ‘एच’, ‘ओ’, ‘ए’, ‘ई’, ‘बी’, ‘सी’ और ‘आर’ दिए जाते हैं। 'एच' संस्तर मिट्टी की सबसे ऊपरी परत है जो किसी आद्र भूमि में पानी के नीचे होती है और इसमें अविघटित या आंशिक रूप से विघटित कार्बनिक पदार्थ होते हैं। 'ओ' संस्तर (ह्यूमस या कार्बनिक संस्तर) आर्द्रभूमि में विघटित कार्बनिक पदार्थ और स्थलीय मिट्टी की सतह पर आंशिक रूप से विघटित कार्बनिक पदार्थ और कचरे से बना है। 'ए' संस्तर (खनिज संस्तर या ऊपरी मिट्टी) में विघटित कार्बनिक पदार्थ और अकार्बनिक खनिज शामिल होते हैं। मिट्टी में रहने वाले जीव भी मुख्यतः इसी संस्तर में पाए जाते हैं। 'ई' संस्तर (निक्षालित संस्तर) तब बनता है जब लोहे, एल्युमिनियम आदि के यौगिक और कार्बनिक पदार्थ इस परत से निक्षालित होकर नीचे आते हैं। 'बी' संस्तर (उप मिट्टी) में लोहा, एल्यूमीनियम और कार्बनिक यौगिक और ‘ए’ तथा ‘ई’ संस्तर से निक्षालित चिकनी मिट्टी शामिल है। 'सी' संस्तर (मूल पदार्थ) नीचे की मूल चट्टान का अपक्षयित क्षेत्र है और 'आर' संस्तर वह आधार चट्टान है जहां से अपक्षयित अकार्बनिक पदार्थ आ रहे हैं। यदि विभेदन की कोई विशिष्ट विशेषता पाई जाती है तो कभी-कभी ऊपरी मिट्टी के संस्तर को और उप-प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है। मिट्टी को गहराई तक खोदकर मिट्टी के संस्तरों को देखा जा सकता है।