वे जीव जो जलीय पर्यावरण (स्थिर या बहते, ताजे/मीठा पानी या समुद्री) के निचले क्षेत्र में रहते हैं, तल के कीचड़ में रहते हैं, उस पर रेंगते हैं, तैरते हैं या एक स्थान पर बैठे रहते हैं, नितलस्थ (बेन्थोस) कहलाते हैं। जलीय पर्यावरण की तलिय परत जहां बेन्थोस पाए जाते हैं उसे बेन्थिक जोन (नितलिय क्षेत्र) कहा जाता है। बेन्थिक जोन का विस्तार तटीय क्षेत्र जहाँ पानी जमीन से मिलता है, से लेकर उथली गहराई में, और वहां से लेकर अत्यधिक गहराई तक जहाँ अभी तक मनुष्य भी नहीं पहुँच सका है, होता है।
बेन्थोस शब्द 1891 में अर्न्स्ट हेकेल द्वारा दिया गया था और यह ग्रीक संज्ञा शब्द से आया है जिसका अर्थ है "(समुद्र की) गहराई "। बेन्थोस जीवन रूपों में पादप रूप (फाइटोबेन्थोस), जंतु रूप (जूबेन्थोस), और सूक्ष्मजीवीय रूप (बेन्थिक माइक्रोफ्लोरा) शामिल हैं जो क्रमशः प्राथमिक उत्पादकों, उपभोक्ताओं और अपघटक के समकक्ष हैं।
बेन्थिक जीवों के प्रकार – बेन्थिक जीवों को उनके आवास के आधार पर तीन समूहों में विभाजित किया जा सकता है –
* हाइपरबेंथोस (ऊपरनितलीय):
इनमें तल के ऊपर तैरने और रहने की क्षमता होती है लेकिन वे इससे जुड़े नहीं होते हैं। जैसे सीप और कौड़ी, घोंघे, तारा मछली, समुद्री अर्चिन, नितलीय डायटम्स आदि।
* एपिबेंथोस (अधिनितलीय):
ये अपना जीवन तलछट चट्टानों पर चिपककर, अथवा कवचों पर चिपक कर रहते हुए बिताते हैं । जैसे कोरल, स्पंज, बार्नेकल, बड़ी शैवालें, समुद्री घास आदि।
* ऐन्डोबेन्थोस (अन्तःनितलीय):
ये तलछट के भीतर बिलों में या भूमिगत सुरंग बनाकर रहते हैं। जैसे ओलिगोकीट कृमि, ट्यूबवर्म आदि।
बेंथोस का महत्व:
बेन्थोस जलीय खाद्य श्रृंखला का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। अधिकतर बेन्थोस ऐसे खाद्य स्रोतों पर निर्भर रहते हैं जो नीचे तक डूब जाते हैं, जैसे कि अकार्बनिक पदार्थ और मृत जीव, लेकिन उनमें से कई एक दूसरे को भी खाते हैं। कई अन्य जीव जैसे मछलियाँ, जलीय पक्षी और अन्य जलीय जीव भी बेन्थिक जीवों पर भोजन के लिए आश्रित होते हैं। ये पर्यावरण में संतुलन बनाये रखने का कार्य करते हैं। ये पानी में डूबे मृत कार्बनिक पदार्थों को अपघटित कर देते हैं और इस प्रकार जलीय पर्यावरण को अपनी भोजन प्रक्रिया के माध्यम से अपशिष्ट, मृत और विघटित सामग्री से साफ रखते हैं। वे जलीय पर्यावरण में पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बेंथोस अपनी उपस्थिति या अनुपस्थिति के माध्यम से जलीय आवास की स्वच्छता/प्रदूषण का संकेत देकर जलीय पर्यावरण के स्वास्थ्य के जैव संकेतक के रूप में भी कार्य करते हैं।